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फाल्गुन मास की पूर्णिमा पर होने वाले होलिका दहन को लेकर इस वर्ष श्रद्धालुओं, ब्राह्मणों और ज्योतिषविदों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है। अलग-अलग पंचांगों और ज्योतिषीय मतों के अनुसार कुछ विद्वान 2 मार्च 2026 को होलिका दहन बता रहे हैं, जबकि कुछ 3 मार्च 2026 को इसे करने की सलाह दे रहे हैं।इस मतभेद का मुख्य कारण भद्रा काल का होना बताया जा रहा है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पूर्णिमा तिथि के प्रथम आधे भाग में विष्टि करण, जिसे भद्रा कहा जाता है, का वास होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भद्रा काल में शुभ कार्य, विशेषकर होलिका दहन और रक्षाबंधन जैसे पर्वों से जुड़े अनुष्ठान करना वर्जित माना जाता है।हर वर्ष क्यों होता है यह भ्रमधार्मिक ग्रंथों के अनुसार होलिका दहन सदैव फाल्गुन मास की पूर्णिमा के दिन प्रदोष काल में किया जाता है, लेकिन यदि इस समय भद्रा विद्यमान हो, तो भद्रा समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन करना शास्त्रसम्मत माना जाता है। इसी कारण कई बार तिथि और समय को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद देखने को मिलता है।ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि आम लोगों के साथ-साथ कई विद्वानों में भी भद्रा के सही स्वरूप और उसके प्रभाव को लेकर पर्याप्त स्पष्टता नहीं होती, जिससे अलग-अलग पंचांगों में भिन्न-भिन्न समय दिए जाते हैं।लोगों से सही जानकारी लेने की अपीलअटल वैदिक ज्योतिष केंद्र के आचार्य गौरव सहाय ने लोगों से अपील की है कि वे भद्रा और होलिका दहन के सही शास्त्रीय नियमों को समझकर ही पर्व मनाएं। उन्होंने कहा कि भद्रा काल समाप्त होने के बाद प्रदोष काल में किया गया होलिका दहन ही शुभ और शास्त्रसम्मत माना जाता है।श्रद्धालुओं को क्या करना चाहिएधार्मिक विशेषज्ञों की सलाह है कि श्रद्धालु अपने स्थानीय पंचांग, मंदिर या विश्वसनीय ज्योतिषाचार्य से परामर्श लेकर ही होलिका दहन का समय सुनिश्चित करें, ताकि पर्व का धार्मिक महत्व और शुभता बनी रहे

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