हूतियों बनाम यमन सेना की जंग में सऊदी कहां से आ गया? जानिए दोनों पक्षों की सैन्य ताकत और हथियारों का पूरा हिसाब
यमन में हूती विद्रोहियों और सरकार समर्थक यमनी सेना के बीच जारी संघर्ष में सऊदी अरब की भूमिका ने लड़ाई को और जटिल बना दिया है। आखिर सऊदी अरब इस जंग में कहां से आया और हूतियों के मुकाबले यमनी सेना के पास कितनी सैन्य ताकत है?
सऊदी अरब का यमन की जंग से क्या कनेक्शन है?
यमन का संघर्ष सिर्फ दो पक्षों के बीच की लड़ाई नहीं है। 2014 में हूतियों ने राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार के समर्थन में 2015 में सऊदी अरब के नेतृत्व वाले गठबंधन ने सैन्य हस्तक्षेप किया।
इसके बाद से सऊदी अरब यमन की सरकार और उसके सहयोगी सैन्य गुटों को समर्थन देता रहा है। इसलिए यमनी सेना और हूतियों के बीच संघर्ष में सऊदी अरब की भूमिका लगातार महत्वपूर्ण रही है।
हूतियों के पास कौन से हथियार हैं?
हूती पारंपरिक अर्थों में किसी देश की नियमित सेना नहीं हैं, लेकिन लंबे समय तक चले युद्ध ने उनकी सैन्य क्षमता काफी बढ़ा दी है। उनके पास ड्रोन, बैलिस्टिक मिसाइल, क्रूज मिसाइल और समुद्री हमले की क्षमता है।
हूतियों की खास ताकत उनकी गुरिल्ला और असममित युद्ध रणनीति है। वे अपेक्षाकृत कम लागत वाले ड्रोन और मिसाइलों से बड़े सैन्य या रणनीतिक ठिकानों को निशाना बनाने की कोशिश करते हैं।
यमनी सेना की स्थिति क्या है?
यमनी सरकार के समर्थन में लड़ने वाली सेना और दूसरे स्थानीय सशस्त्र गुटों के पास भारी हथियार, बख्तरबंद वाहन और सैन्य विमान जैसी क्षमताएं हैं। इन्हें सऊदी अरब से हथियार, प्रशिक्षण, वित्तीय और लॉजिस्टिक सहायता भी मिलती रही है।
हालांकि सरकार समर्थक खेमे की एक बड़ी कमजोरी एकीकृत कमान का अभाव है। अलग-अलग गुटों के अपने राजनीतिक और सैन्य हित होने के कारण हूतियों के खिलाफ मोर्चा हमेशा एक जैसा नहीं रहा।
ताकत में कौन आगे?
अगर आधुनिक हथियारों और सैन्य संसाधनों की बात करें तो सऊदी समर्थित सरकारी बलों के पास ज्यादा पारंपरिक सैन्य क्षमता है। वहीं हूतियों की ताकत उनकी मिसाइल और ड्रोन क्षमता, पहाड़ी इलाकों में पकड़ और असममित युद्ध रणनीति में है।
यही वजह है कि ज्यादा आधुनिक हथियार और बड़ी सैन्य क्षमता होने के बावजूद यमन में संघर्ष को निर्णायक रूप से खत्म करना आसान नहीं रहा।
सऊदी के लिए यह जंग क्यों अहम है?
यमन की भौगोलिक स्थिति सऊदी अरब के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। हूतियों की मिसाइल और ड्रोन क्षमता सऊदी सीमा, तेल प्रतिष्ठानों और क्षेत्रीय समुद्री व्यापार के लिए खतरा पैदा कर सकती है। इसके अलावा लाल सागर और बाब-अल-मंदेब जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग भी इस संघर्ष से प्रभावित हो सकते हैं।
यही कारण है कि यमन में होने वाली किसी भी बड़ी सैन्य हलचल पर सऊदी अरब की नजर रहती है और वह अपने सहयोगी यमनी बलों को समर्थन देता है।
निष्कर्ष
इसलिए यमन की लड़ाई को केवल “हूती बनाम यमन सेना” कहना पूरी तस्वीर नहीं है। एक तरफ हूती आंदोलन है, जिसे ईरान से समर्थन मिलने के आरोप लगते रहे हैं, जबकि दूसरी तरफ अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त यमनी सरकार और उसके सहयोगी गुट हैं, जिन्हें सऊदी अरब लंबे समय से समर्थन देता रहा है। इसी वजह से यमन का संघर्ष स्थानीय लड़ाई से आगे बढ़कर पूरे मिडिल ईस्ट की सुरक्षा और लाल सागर के समुद्री मार्गों से जुड़ा हुआ है।