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कांवड़ यात्रा 2026: कब से शुरू होगी, कब तक चलेगी और क्यों निकाली जाती है?

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कांवड़ यात्रा 2026 की शुरुआत 30 जुलाई 2026 से होगी और इसका समापन 11 अगस्त 2026 को सावन शिवरात्रि के दिन होगा। यह यात्रा भगवान शिव के प्रति आस्था, भक्ति और समर्पण का सबसे बड़ा धार्मिक आयोजन मानी जाती है। हर वर्ष सावन माह में देशभर से करोड़ों शिवभक्त, जिन्हें कांवड़िया कहा जाता है, उत्तराखंड के हरिद्वार, ऋषिकेश, गंगोत्री, गौमुख, उत्तर प्रदेश के प्रयागराज और बिहार के सुल्तानगंज जैसे पवित्र तीर्थों से गंगाजल लेकर सैकड़ों किलोमीटर पैदल यात्रा करते हैं। इसके बाद वे अपने-अपने शहरों और गांवों के शिव मंदिरों में पहुंचकर भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, समुद्र मंथन के समय निकले विष को भगवान शिव ने संसार की रक्षा के लिए अपने कंठ में धारण किया था। विष की तीव्रता को शांत करने के लिए देवताओं ने उन पर पवित्र गंगाजल अर्पित किया। तभी से सावन में भगवान शिव को गंगाजल चढ़ाने की परंपरा चली आ रही है। मान्यता है कि इस दौरान श्रद्धा और नियमों के साथ कांवड़ यात्रा करने तथा शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित करने से भगवान शिव प्रसन्न होते हैं, जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य तथा मनोकामनाओं की प्राप्ति होती है।

कांवड़ यात्रा के दौरान श्रद्धालु भगवा वस्त्र धारण करते हैं और पूरी यात्रा में सात्विक भोजन, संयम तथा अनुशासन का पालन करते हैं। कई श्रद्धालु नंगे पैर यात्रा करते हैं, जबकि कुछ डाक कांवड़ के रूप में बिना रुके दौड़ते हुए जल लेकर आते हैं। यात्रा मार्ग पर जगह-जगह भंडारे, चिकित्सा शिविर, विश्राम स्थल और पेयजल की व्यवस्था की जाती है। पुलिस, प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग सुरक्षा, ट्रैफिक प्रबंधन और आपातकालीन सेवाओं के लिए विशेष इंतजाम करते हैं ताकि करोड़ों श्रद्धालुओं की यात्रा सुरक्षित और सुचारु रूप से पूरी हो सके।
कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, सेवा, अनुशासन और आस्था का भी प्रतीक मानी जाती है। हर वर्ष इसमें देशभर से करोड़ों श्रद्धालु भाग लेते हैं, जिससे यह भारत के सबसे बड़े धार्मिक आयोजनों में शामिल होती है।

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