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*प्रकृति में बसते महादेव, संरक्षण में बसता भविष्य

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पंकज मिश्राभारतीय संस्कृति में प्रकृति और भगवान शिव का संबंध केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन-दर्शन का गहरा संदेश देता है। जब हम प्रकृति को देखते हैं, जैसे ऊँचे पर्वत, बहती नदियाँ, हरे-भरे वन, अनंत आकाश तो ऐसा प्रतीत होता है, मानो स्वयं शिव का विराट स्वरूप हमारे सामने खड़ा हो।शिव को आदियोगी कहा जाता है, वह जो सृष्टि के आरंभ और अंत दोनों के स्वामी हैं। उनका निवास हिमालय पर माना गया है। हिमालय की श्वेत चोटियाँ उनकी शांति और स्थिरता का प्रतीक हैं। जिस प्रकार पर्वत अडिग खड़े रहते हैं, उसी प्रकार शिव भी ध्यान में लीन, संतुलन और आत्मनियंत्रण का संदेश देते हैं।शिव का वैराग्य और प्रकृति की सादगीशिव भस्म धारण करते हैं, व्याघ्रचर्म पहनते हैं, और सरल जीवन जीते हैं। उनका स्वरूप हमें सिखाता है कि सच्चा वैभव बाहरी आडंबर में नहीं, बल्कि आंतरिक संतुलन में है। प्रकृति भी हमें यही शिक्षा देती है। एक बीज बिना किसी दिखावे के विशाल वृक्ष बन जाता है। सूर्य बिना अपेक्षा के प्रकाश देता है। चंद्रमा बिना शोर के शीतलता बाँटता है। यही शिवत्व है, यानि निस्वार्थ, शांत और कल्याणकारी।*संहार नहीं, नवसृजन का संदेश*शिव को संहार का देवता कहा जाता है, परंतु उनका संहार विनाश के लिए नहीं, बल्कि सृजन के लिए होता है। जब पुराना नष्ट होता है, तभी नया जन्म लेता है। प्रकृति भी इसी नियम पर चलती है। पतझड़ के बाद ही वसंत आता है। सूखी धरती पर वर्षा नई हरियाली लाती है। यह चक्र हमें सिखाता है कि परिवर्तन से डरना नहीं चाहिए। परिवर्तन ही जीवन का शाश्वत सत्य है।*गंगा, जल और जीवन का प्रवाह*गंगा शिव की जटाओं से अवतरित हुईं। यह कथा केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि जल के महत्व का संदेश है। जल जीवन है, और उसका संरक्षण हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। जब हम नदियों को स्वच्छ रखते हैं, जल को बचाते हैं, तब हम शिव की सच्ची आराधना करते हैं।*नंदी का धैर्य और पृथ्वी की सहनशीलता*शिव के वाहन नंदी धैर्य, निष्ठा और शक्ति के प्रतीक हैं। पृथ्वी भी नंदी की तरह धैर्यवान है। वह मानव के अत्याचार सहती है। वनों की कटाई, प्रदूषण, संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, फिर भी जीवन देती रहती है। किंतु उसकी सहनशीलता की भी एक सीमा है। यदि हम नहीं जागे, तो संतुलन बिगड़ जाएगा।*प्रकृति की रक्षा: शिव की सच्ची पूजा*आज आवश्यकता इस बात की है कि हम मंदिरों में दीप जलाने के साथ-साथ पृथ्वी के लिए भी एक दीप जलाएँ। एक वृक्ष लगाना, जल बचाना, पशु-पक्षियों की रक्षा करना, ये सब शिव भक्ति के आधुनिक रूप हैं।शिव केवल कैलाश पर नहीं, हर पर्वत में हैं।शिव केवल मंत्रों में नहीं, हर पवन के स्पंदन में हैं।शिव केवल प्रतिमा में नहीं, हर जीव में हैं।जब हम प्रकृति का सम्मान करते हैं, तब हम शिवत्व को अपने जीवन में उतारते हैं। यही भारतीय संस्कृति का संदेश है। प्रकृति ही परमात्मा है, और उसकी रक्षा ही सच्ची साधना है।(लेखक केंद्रीय पर्यावरण वन एवं जलवायु परिवर्तन तथा विदेशी राज्यमंत्री के वरिष्ठ सलाहकार रह चुके हैं)

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